‘ही-मैन’ का मौन सफ़र: धर्मेंद्र की सादगी, शोले की विरासत और करोड़ों दिलों का अटूट प्यार

धर्मेंद्र

I. परिचय: एक चमकता सितारा जो खामोश हो गया

A. दिलीप कुमार की शिकायत: “भगवान, तूने मुझे धर्मेंद्र जैसा खूबसूरत क्यों नहीं बनाया?”

दिलीप कुमार ने एक बार हंसते-हंसते कहा था कि जब मैं भगवान से मिलूंगा तो एक शिकायत करूंगा कि भगवान तूने मुझे धर्मेंद्र के जितना खूबसूरत क्यों नहीं बनाया। ज़रा सोचिए, जिस इंसान की सुंदरता के आगे दिलीप कुमार जैसा मास्टर एक्टर खुद को छोटा महसूस कर रहा था, उसका कद कितना बड़ा होगा। आज वही धर्मेंद्र, वही पंजाब का किसान, पंजाब का बेटा, सिनेमा का ‘ही-मैन’, चुपचाप शायद उसी भगवान के पास लौट गया है।

B. सिनेमा के उस बेटे का जाना, जो कभी थका या बूढ़ा नहीं लगा

आज जब यह खबर आई कि धर्मेंद्र साहब नहीं रहे, तो करोड़ों का दिल टूटा। बॉलीवुड का सबसे चमकता सितारा अचानक से खामोश हो गया। वह तारा जो कभी थका नहीं था, जो कभी बूढ़ा नहीं लगा, जो हमेशा एक दोस्त की तरह मुस्कुराता हुआ मिला।

C. आम इंसान जैसा सुपरस्टार: वीरू की शरारत और आक्रोश का एहसास

वह सुपरस्टार होकर भी आम इंसान के जैसा दिख रहा था। वह एहसास लेकर चला गया जो हमने शोले के वीरू की शरारती हंसी में देखा था, पानी की टंकी पर चढ़कर उसकी शरारत में देखा था। ‘गब्बर के सामने इन कुत्तों के सामने मत नाचना बसंती’ के आक्रोश में देखा था। चाहे जवानी में शोले हो या बुढ़ापे में रॉकी रानी कहानी, हर बार यह एहसास हुआ कि ये हम में से ही कोई है—हाँ, ज्यादा हैंडसम, थोड़ा दमदार और कहीं ज्यादा फिल्मी।

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II. धर्मेंद्र का सार: सादगी, ईमानदारी और खुलापन

A. खूबसूरती का सबसे बड़ा राज़: सरलता और सच्चे दिल का होना

धर्मेंद्र की खूबसूरती का सबसे बड़ा राज उनकी सरलता थी। धर्मेंद्र सुपरस्टार होकर भी सुपरस्टार जैसे नहीं थे। वो दिग्गज होकर भी दिग्गजों जैसे नहीं रहते थे; इतने बड़े होकर भी वो आम लगते थे, क्योंकि दिल के साफ थे, खुले हुए थे, सच्चे इंसान थे।

B. शराब पीकर भी शराफत नहीं भूलने वाले इंसान

शराब पीकर भी शराफत कभी नहीं भूलने वाले इंसान थे। प्यार करके अहंकार नहीं करने वाले इंसान थे। उनकी जिंदगी में भी कई उतार-चढ़ाव आए, कई बार चोट लगी, दिल टूटा, पर धर्मेंद्र का दिल कड़वा नहीं हुआ।

C. बॉलीवुड में भी अपनी कमजोरी छिपाए बिना डिप्रेशन की बात करना

धर्मेंद्र वह थे जिन्होंने बॉलीवुड की चमक-दमक के बीच में भी अपनी कमजोरियों को छिपाया नहीं। बताया कि उन्हें भी डिप्रेशन हुआ। कहा कि मैं इंसान हूँ, अकेलापन मुझे भी एहसास कराता है। उस दौर में यह सब कहा जब मेंटल हेल्थ के बारे में बात करना लगभग पाप था, लेकिन धर्मेंद्र ने आंसू नहीं छिपाए। यही बात उन्हें हमसे अलग नहीं बल्कि और करीब लाती है।

III. पंजाब से मुंबई तक का सफ़र

A. फ़िरोजपुर का गाँव: खेत, हल और ट्रेन में बैठने का सपना

धर्मेंद्र 8 दिसंबर साल 1935 को पंजाब के फ़िरोजपुर जिले के एक छोटे से गाँव में पैदा होते हैं। घर में मिट्टी के तेल का लैंप जलता था। पिता हेड मास्टर थे, मां देसी घी की खुशबू से घर को भरा रखती थीं। धर्मेंद्र सुबह खेत जाते, हल जोतते और फिर कहीं दूर ट्रेन की सीटी सुनकर सोचते कि एक दिन मैं इस ट्रेन में बैठूंगा।

B. अखाड़े के चैंपियन और देसी मर्द की पहचान

धर्मेंद्र पढ़ाई में औसत थे, लेकिन अखाड़े में उनके सामने कोई टिकता नहीं था। दंड बैठक, पहलवानी, कुश्ती—बदन ऐसा कि गांव वाले भी कहते: “शरीर हो तो ऐसा, मर्द हो तो धर्मेंद्र के जैसा।” वह अक्सर रेडियो पर लता, रफ़ी के गाने सुनते और तारों को देखते हुए सोचते कि एक रोज़ मैं भी ऐसे बनूंगा।

C. घर से भागकर मुंबई पहुँचना और चर्च गेट पर सोना

साल 1954 में 10वीं पास की। घर वालों ने नौकरी करने को कहा, लेकिन उनका दिल कहीं और धड़क रहा था। एक रोज़ चुपके से घर में कुछ पैसे लिए, मां का बनाया अचार का डिब्बा उठाया और ढेर सारे सपनों को लेकर निकल पड़े। मुंबई पहुँचे तो पहले कुछ दिन चर्च गेट स्टेशन के बेंच पर सोए।

D. फिल्मफेयर टैलेंट हंट और पहली फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ (1960)

फिल्मफेयर के टैलेंट हंट में लाइन लगाई। जब जजों ने उन्हें देखा तो कहा: “यार यह तो हीरो है, यह तो असली मर्द है, देसी मर्द है, इसको हीरो बनना चाहिए।” और मिल गई पहली फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ (साल 1960)।

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IV. ‘ही-मैन’ का दौर: बॉलीवुड पर राज

A. 1960 से 1980: बॉलीवुड का चेहरा बने धर्मेंद्र

इसके बाद उस दौर की शुरुआत हुई जब राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की लड़ाई चल रही थी, लेकिन उस दौर में धर्मेंद्र ही बॉलीवुड बनकर बैठ गए थे। 1960 से 1980 तक बॉलीवुड का कोई एक चेहरा चुनना हो तो वो धर्मेंद्र होंगे, क्योंकि राजेश खन्ना का रोमांटिक जादू था, अमिताभ का एंग्री यंग मैन था, लेकिन धर्मेंद्र सब कुछ थे।

B. ‘फूल और पत्थर’ (1966) और पर्दे पर बिना शर्ट आने वाले पहले हीरो

साल 1966 में ‘फूल और पत्थर’ आई, तो पहली बार कोई हीरो बिना शर्ट के पर्दे पर दिखाई पड़ा। थिएटर में लड़कियाँ चीखने लगीं। उस फिल्म ने उन्हें सुपरस्टार बना दिया।

C. सीता और गीता से चुपके-चुपके: सौ रंगों वाला व्यक्तित्व

‘आया सावन झूम के’ में नूतन के साथ रोमांस। ‘मेरा गांव मेरा देश’ में जाट का गुस्सा जो ‘प्रतिज्ञा’ में बदला। ‘चुपके-चुपके’ में शरारतें, ‘सीता और गीता’ में हेमा मालिनी के साथ मस्ती—एक ही आदमी के 100 रंग थे।

D. अमर किरदार ‘वीरू’: ‘शोले’ का प्रेम, दोस्ती और पीढ़ियों की भाषा

और फिर साल 1975 में वह किरदार जिसने धर्मेंद्र को अमर कर दिया—‘शोले’ में वीरू। वह टंकी पर चढ़कर प्रेम का इजहार करना, वह गब्बर के सामने डायलॉग—आज भी सच कहें तो पीढ़ियों की समझ की भाषा है। उनका गाना ‘यह दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ आज भी लोगों को दोस्ती का एहसास कराता है।

V. निजी जीवन: प्यार और रिश्तों का संतुलन

A. हेमा मालिनी से प्यार और सारे नियमों को तोड़ देना

इसी दौर में धर्मेंद्र को हेमा मालिनी से प्यार हो गया। धर्मेंद्र तब शादीशुदा थे, दो बच्चों (सनी देओल, बॉबी देओल) के पिता थे, लेकिन प्यार ने सारे नियम तोड़ दिए। हेमा मालिनी ने कहा कि वह सिर्फ धर्मेंद्र से शादी करेंगी।

B. इस्लाम कबूल कर ‘दिलावर खान’ बनना और दूसरी शादी

साल 1980 में धर्मेंद्र ने इस्लाम कबूल कर लिया और नाम बदलकर रखा दिलावर खान, जिसके बाद उन्होंने हेमा मालिनी से दूसरी शादी की।

C. प्रकाश कौर का बड़प्पन: बिना तलाक के दो घरों का संतुलन

हालांकि, उनकी पहली पत्नी प्रकाश कौर ने कभी तलाक नहीं लिया। प्रकाश कौर ने एक बार कहा था कि वह कौन सा मर्द होगा जो हेमा मालिनी को देखकर फिसलेगा नहीं, मैं धर्मेंद्र की गलती नहीं मानती। धर्मेंद्र ने भी कभी किसी को छोड़ा नहीं।

D. सनी, बॉबी, ईशा और अहाना: बिना शोर के ढेरों प्यार

दो बेटे (सनी देओल, बॉबी देओल) और इधर दो बेटियाँ (ईशा, अहाना)—एक ही आदमी, दो घर, ढेर सारा प्यार। यह सब बिना शोर के, बिना किसी ड्रामे के चलता रहा।

VI. ‘रिटायर न होने वाला’ सितारा: अंतिम दौर

A. बेटे और पोतों के साथ ‘यमला पगला दीवाना’ में मौज-मस्ती

उम्र बढ़ती रही, लेकिन धर्मेंद्र कभी रिटायर्ड नहीं हुए। जब बाकी हीरो रिटायर हो रहे थे, तो धर्मेंद्र स्क्रीन पर आग लगा रहे थे। 2007 में ‘अपने’ में एक साथ तीन पीढ़ियों को लेकर आए और ‘यमला पगला दीवाना’ में बेटों के साथ मौज-मस्ती की।

B. ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ में उम्र को मात देता किरदार

और 2023 में ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ में वह किरदार निभाया, जो उस उम्र में भी जब स्क्रीन पर आया तो बाकी सारे सितारे उनके सामने फीके पड़े नजर आए।

C. बाल सफेद, आवाज धीमी, पर आँखों में वही शरारत

धर्मेंद्र के बाल सफेद हो गए थे, आवाज धीमी पड़ गई थी, लेकिन आँखों में वही शरारत थी, वही मुस्कान थी, वही पंजाब की खुशबू थी।

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VII. अमर विरासत: धर्मेंद्र हमेशा जवान रहेंगे

A. अंतिम सलाम: रोने नहीं, हँसने और जीने की सीख

24 नवंबर 2025 की सुबह जब खबर सच साबित हुई, तो मानो जैसे कोई अपना चला गया। लोग रो रहे हैं, लेकिन मुस्कुराहट के साथ। ऐसा इसलिए क्योंकि धर्मेंद्र ने कभी रोना सिखाया ही नहीं—हँसना सिखाया, जीना सिखाया।

B. करोड़ों दिलों में बसा इंसान कभी नहीं मरता

सच यह है कि धर्मेंद्र मरे नहीं हैं। शरीर चला गया है, धड़कनें थम गई हैं, लेकिन जो आदमी करोड़ों दिलों में बसा हो, जिसकी हंसी आज भी टीवी पर गूंजती हो, जिसकी दोस्ती दोस्तों के बीच गाई जाती हो, वो कहाँ मरता है?

C. दिलीप साहब से मुलाक़ात: शिकायत मत करना!

वह तो बस शायद दिलीप कुमार की शिकायत के बाद उस भगवान के पास चले गए हैं, जिसने उन्हें दिलीप कुमार से खूबसूरत बनाया था। अब शायद दिलीप साहब, राजेश खन्ना, शम्मी कपूर सब साथ बैठे होंगे, और शायद धर्मेंद्र वहाँ बैठकर दिलीप साहब से मस्ती करते हुए कह रहे होंगे: “दिलीप साहब, अब शिकायत मत करना!”

D. हमेशा जवान ‘ही-मैन’ के रूप में अंतिम सलाम

धर्मेंद्र जहाँ भी रहेंगे, वो हमेशा जवान रहेंगे—वही पंजाब का सोना, वही ‘ही-मैन’ बनकर रहेंगे। आज उन्हें एक आखिरी सलाम—एक प्रशंसक के तौर पर, एक किसान पुत्र के तौर पर, एक इंसान के तौर पर।

रेस्ट इन पीस धर्म साहब

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