I. मुख्य बहस: सुरक्षा टूल या सरकारी जासूसी?
A. जनता में भ्रम: क्या सरकार आपके मोबाइल फोन के अंदर झाँकना चाहती है?
क्या मोदी सरकार सच में आपके मोबाइल फोन के अंदर झांकना चाहती है? क्या संचार साथी ऐप इंस्टॉल करवाने के बहाने सरकार यह जानना चाहती है कि आप किससे बात करते हैं, किससे चैट करते हैं, क्या चैट करते हैं, कौन आपके फोन पर फोन करता है, कौन सा ओटीपी आता है, आधी रात को किससे बात करते हैं, वो कौन सी फोटो है जो आपने मोबाइल में छिपा रखी है? क्या संचार साथी ऐप को पहले से फोन के अंदर इंस्टॉल करवाकर सरकार आपके कैमरे, माइक्रोफोन, फाइल, लोकेशन तक पहुंचना चाहती है?
B. सरकारी दावा बनाम विपक्ष का आरोप: साइबर फ्रॉड या सरकारी चौकीदार?
या फिर जो सरकार कह रही है कि एक सुरक्षा टूल है, या वो बात जो विपक्ष कह रहा है कि अब मोदी जी की टीम आपके फोन में एक सरकारी चौकीदार बैठाने वाली है? जनता कंफ्यूज है कि सरकार की बात सुनकर इस बात को माने कि साइबर फ्रॉड रोकने की दिशा में यह बड़ा कदम है या 140 करोड़ लोगों की जिंदगी पर अब नए दौर में नजर रखने की एक धीमी शुरुआत।
C. मूल प्रश्न: क्या संचार साथी निजता का दरवाजा सरकार को सौंप देना है?
सवाल यह है कि आपके फोन में संचार साथी का होना आपकी निजता का दरवाजा सरकार के हाथ में सौंप देने जैसा है या विपक्ष जो है इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहा है। सवाल यह भी कि आपके मोबाइल फोन में पहले से बहुत सारे ऐप हैं, तो फिर संचार साथी ऐप में हम और आप इतना घबरा क्यों रहे हैं?
II. संचार साथी ऐप क्या है और इसके दावे क्या हैं?
A. ऐप की शुरुआत: मई 2023 में वेब पोर्टल और जनवरी 2025 में मोबाइल ऐप
देखिए, संचार साथी सरकार का साइबर सिक्योरिटी ऐप है। इसकी शुरुआत मई 2030 में हुई थी जब इसका वेब पोर्टल लॉन्च हुआ था। इसके बाद 17 जनवरी 2025 को इसका मोबाइल ऐप सामने आ गया।
B. सुरक्षा के दावे: मोबाइल चोरी, नकली IMEI और फ़र्ज़ी सिम कार्ड से निपटना
सरकार यह दावा करती है कि देश में जो साइबर फ्रॉड हो रहा है, मोबाइल चोरी हो रही है, नकली आईएमआई या फर्जी सिम कार्ड जैसी चुनौतियां हैं, उससे रोकने में यह मदद करेगा।
C. CEIR डेटाबेस से जुड़ाव और ऐप की सुविधाएँ
यह ऐप जो है यह सीईआईआर नाम के सेंट्रल डेटाबेस से जुड़ा है जहाँ देश के सभी आईएमआई नंबर दर्ज हैं। यानी आपका फोन चोरी हुआ तो कहीं भी चालू होगा, उसे ट्रैक कर सकते हैं। इस ऐप के जरिए मोबाइल खोने की आप रिपोर्ट कर सकते हैं, आईएमआई चेक कर सकते हैं, फोन असली नकली चेक कर सकते हैं, आपके नंबर पर कितने आईडी हैं वो चेक कर सकते हैं और संदिग्ध कॉल मैसेज की रिपोर्ट कर सकते हैं।
D. सफलता के आँकड़े
सरकार यह भी दावा करती है कि इसके जरिए 42 लाख चोरी खोए हुए मोबाइल फोन ब्लॉक किए गए हैं, 26 लाख फोन खोजे गए हैं। अब तक इसे सवा करोड़ लोग लगभग इंस्टॉल कर चुके हैं।
III. विवाद की जड़: प्री-इंस्टॉलेशन का सरकारी आदेश
A. 1 दिसंबर 2025 की घोषणा: सभी नए स्मार्टफ़ोन में ऐप का अनिवार्य होना
बवाल वहाँ पर हुआ जहाँ पर 1 दिसंबर 2025 को सरकार ने घोषणा की कि आज से जितने भी नए स्मार्टफोन आएंगे उसमें यह ऐप प्री-इंस्टॉल्ड रहेगा। किसी भी कंपनी को 90 दिन के भीतर इसे लागू करना होगा, और यहीं से विवाद शुरू हो गया।
B. विश्वास पर सवाल: सुझाव के बजाय आदेश क्यों?
सरकार सुझाव नहीं दे रही थी, सरकार किसी ऐप को हर आने वाले नए स्मार्टफोन में पहले से इंस्टॉल करने का आदेश दे रही थी। और जब सरकार आदेश दे तब सवाल सिर्फ ऐप का नहीं होता है, सवाल भरोसे का हो जाता है। सवाल तकनीक का नहीं, इरादे का हो जाता है, और संचार साथी के साथ यही हुआ।
C. विपक्ष का आरोप: ‘सरकारी चौकीदार’ और ‘बिग बॉस टाइप निगरानी’
विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह सरकारी चौकीदार बैठाने जैसा है। विपक्ष कह रहा है कि भाई पेगस टाइप का निगरानी वाला हिसाब किताब है, बिग बॉस जैसा हो गया है, आपके हर कदम पर नजर रखी जाएगी। यह बीजेपी सरकार की तरफ से निगरानी की शुरुआत है, यह विपक्ष के दावे थे।
IV. तर्क-वितर्क: सरकार और विरोधियों के दावे
A. सरकार का पक्ष: साइबर अपराध में विस्फोट और सुरक्षा की आवश्यकता
सरकार का तर्क यह था कि भारत में साइबर अपराध जो है वो विस्फोट की तरह बढ़ा है। 2024 में देश में 22.68 लाख साइबर फ्रॉड दर्ज हुए, लगभग 10 लाख फर्जी सिम पकड़े गए, 2.63 लाख नकली आईएमआई आए, दिल्ली में ही 4 लाख स्मार्टफोन चोरी हुए। हर साल 50 लाख फोन चोरी गुम होते हैं, सरकार कहेगी इसके लिए जरूरी है।
B. सरकारी तर्क: लोग खुद डाउनलोड नहीं कर रहे, इसलिए प्री-इंस्टॉल करना ज़रूरी
दूसरा तर्क यह था कि यार ऐप जो है सरकार पहले मोटिवेट कर रही थी कि डाउनलोड कर लीजिए, लोग खुद डाउनलोड नहीं कर रहे थे इसलिए गुम और चोरी का सिस्टम काम नहीं कर रहा था, इसलिए हम कह रहे हैं कि आप खुद ही इंस्टॉल करके दे दीजिए। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा बाद में आप चाहें तो इसे हटा सकते हैं, मजबूरी नहीं है।
C. निगरानी का डर: आज एक ऐप, कल को दूसरा; IMEI से चैट/कैमरा तक पहुँच का संदेह
लेकिन डर सारा यहीं से शुरू हुआ कि जब सरकार के पास यह ताकत आ जाए कि वो एक ऐप को हर फोन में डाल सकती है: आज एक ऐप, कल को दूसरा ऐप, आज सिर्फ आईएमआई तक पहुँच, कल को चैट, कैमरा—तो फिर आदमी के मन में संदेह पैदा होना शुरू होता है।
D. विशेषज्ञों की चेतावनी: निजता का हनन और ‘डिजिटल प्रोफाइलिंग’ की शुरुआत
विपक्ष का यह दावा है कि यह ऐप नागरिकों की निजता पर आता है, सरकार निगरानी बढ़ाना चाहती है। डिजिटल पॉलिसी के एक्सपर्ट्स थे वो कह रहे थे कि सरकार रिएक्शन देख रही है कि आज अगर कम रिएक्शन आया तो एक ऐप कल दूसरा है। आज एक इंस्टॉल करवाए तो रास्ता आसान हो जाएगा।
V. गोपनीयता का अंतर: संचार साथी बनाम निजी ऐप्स
A. समानता: WhatsApp, Facebook, Instagram भी मांगते हैं परमिशन
जो सरकार के समर्थक कहते हैं भाई साहब बाकी भी एप्स तो आप इंस्टॉल कर रहे हैं। आप Facebook देखिए, सारी परमिशन ले रहा है, इंस्टा परमिशन ले रहा है, WhatsApp ले रहा है। हाँ, ये सच है कि WhatsApp, ट्रू कॉलर, Instagram बहुत सारी परमिशन लेते हैं।
B. दो बड़े फ़र्क़: मर्जी की चॉइस बनाम सरकारी अनिवार्यता
दो बड़े फर्क हैं। पहला फर्क: बाकी जो ऐप आप इंस्टॉल करते हैं वह आप अपनी मर्जी से करते हैं, आपकी चॉइस है। संचार साथी में चॉइस कम है क्योंकि यह फोन के साथ आएगा।
C. डाटा का उपयोग: निजी कंपनियों का व्यावसायिक उपयोग बनाम सरकार का 360° व्यू
निजी कंपनियाँ डाटा चुराती हैं, सच है, लेकिन वह आपका डाटा व्यावसायिक उपयोग करती है। लेकिन अगर इसमें मोबाइल की कनेक्टिविटी भी जुड़ गई, तो ऐसा हो सकता है कि भविष्य में सरकार के पास किसी नागरिक की पूरी डिजिटल पहचान का 360° व्यू बन जाएगा।
D. सरकारी ताकत: आधार, पैन और बैंकिंग डेटा के साथ मोबाइल कनेक्टिविटी का जुड़ना
सरकार के पास आपके आधार, बैंकिंग, टैक्स, स्वास्थ्य, पहचान और सोशल प्रोफाइल का डाटा पहले से मौजूद है। दूसरा, सरकारी, आपका डाटा सरकार के पास जाता है। प्राइवेसी एक्सपर्ट इसे डिजिटल प्रोफाइलिंग की शुरुआत मानते हैं।
VI. अनइंस्टॉल और एप्पल का विरोध
A. क्या ऐप हटाया जा सकता है? सरकार और आलोचकों के अलग-अलग तर्क
सरकार कह रही है कि इस ऐप को आप अनइंस्टॉल कर सकते हैं, हटा सकते हैं, लेकिन आलोचक कहते हैं कि आज हटा सकते हैं, कल को अपडेट में हटाने का ऑप्शन बंद कर दिया फिर।
B. भविष्य का डर: अपडेट में अनइंस्टॉल ऑप्शन बंद होने की आशंका
कई सरकारी या कंपनी वाले प्री-इंस्टॉल ऐप हटाए नहीं जाते, पहले से भी वो डिसेबल होते हैं। डर इसी बात का है कि फिर यह सरकारी कंट्रोल में हो जाएगा।
C. इंडस्ट्री का विरोध: Apple ने क्यों किया प्री-इंस्टॉल करने से इनकार?
क्या स्मार्टफोन कंपनियाँ संचार साथी ऐप को इंस्टॉल करने से मना कर सकती हैं? हाँ, Apple का एग्जांपल हमने दिया। Apple ने प्री-इंस्टॉल करने से मना कर दिया, कहा कि थर्ड पार्टी ऐप को मजबूरी में फोन में हम नहीं डालते।
D. निजता कमिटमेंट पर सवाल और डेटा प्रोटेक्शन एक्ट का हवाला
Apple ने भी यही तर्क दिया था कि यह हमारी प्राइवेसी जो देने का कमिटमेंट है उस पर क्वेश्चन कर सकता है। Apple डेटा प्रोटेक्शन एक्ट का हवाला देता है और इसी को लेकर कोर्ट जाता है।
VII. निष्कर्ष: यूज़र को क्या करना चाहिए?
A. अंतिम सलाह: प्राइवेसी कॉन्फिडेंस पर निर्भर करता है डाउनलोड
देखिए, यह आपके प्राइवेसी कॉन्फिडेंस पर निर्भर करता है। अगर आप आईएमआई चेक, खोया फोन ढूंढना, फर्जी सिम चेक करना चाहते हैं, तो यह ऐप आपके लिए मददगार है। लेकिन अगर आप प्राइवेसी फोकस यूजर हैं, तो इंस्टॉल ना करें या हटाए रखें।
B. सुरक्षा के लिए उपयोगी; निजता के लिए खतरा
कुल मिलाकर कहें तो थोड़ा डर है। सुरक्षा तर्क मजबूत है, लेकिन निगरानी का भी खतरा उतना बड़ा है। संचार साथी सच है कि एक उपयोगी ऐप है, लेकिन एक संभावित खतरा भी हो सकता है।
C. तकनीक सिर्फ़ तकनीक नहीं होती: शक्ति के हाथ में हथियार
हाँ, इतना ज़रूर है कि तकनीक कभी सिर्फ़ तकनीक नहीं होती, वो हमेशा किसी शक्ति के हाथ में एक हथियार होती है—या तो लोगों को बचाने वाला हथियार, या उन्हें नियंत्रित करने वाला।
D. इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण: आपकी आज़ादी और आपका अधिकार
फर्क इस बात पर है कि आप किस बात पर भरोसा करते हैं, सरकार के इरादों पर या विपक्ष की चेतावनीयों पर। अब इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण है आपकी प्रवेसी, आपकी आजादी और आपका अधिकार।
जय हिंद, जय भारत, नमस्कार।



