I. परिचय: रुपया गिर गया या गिराया गया?
बीते सालों में लोग कहते थे कि भैया डॉलर बढ़ा है, इसलिए रुपया कमजोर होता है, लेकिन क्या अब यह मानना सही है कि सिर्फ डॉलर नहीं बढ़ा है? इस बार कहानी जो है वह उल्टी है। इस बार कहानी है कि Rupee Fall। इस बार कहानी सिर्फ डॉलर की नहीं है, कहानी यूरो की है, पाउंड की है, येन की है, युवान की है और उस सच की है जो रुपए को लेकर नीर और रीर ने बयां तो किया था लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।
पिछले हफ्ते जब रुपया $1 के मुकाबले 89.46 पर बंद हुआ तो हेडलाइन बनी कि डॉलर के सामने रुपए में गिरावट थी, लेकिन किसी ने यह पूछा नहीं कि यह गिरावट सिर्फ डॉलर के सामने थी या फिर यूरो, पाउंड और यहाँ तक कि जापानी यन के मुकाबले भी भारत का रुपया बहुत ज्यादा गिरा, इतना गिरा कि वाकई में गिरा हुआ लग रहा है। पाउंड के खिलाफ गिरावट डॉलर से ज्यादा तेज है। यानी कहानी यह है कि डॉलर मजबूत होने वाली थ्योरी इस बार नहीं है, इस बार रुपए के कमजोर होने वाली कहानी है।
संचार साथी ऐप: सुरक्षा कवच या सरकारी ‘चौकीदार’? निजता (Privacy) और निगरानी पर पूरा विश्लेषण
II. रुपए की सेहत का मेडिकल टेस्ट: NEER (नीर) क्या है?
इसको समझने के लिए हम उन दो शब्दों को भी समझेंगे जिनका नाम जितना कठिन लगता है मतलब उतना आसान है। नाम है नीर (NEER) और रीर (REER)। यह दोनों इंडेक्स रुपए की सेहत का असली मेडिकल टेस्ट है।
नीर यानी नॉमिनल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (Nominal Effective Exchange Rate)। एक ऐसा इंडेक्स जो यह बताता है कि रुपया दुनिया की 40 सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं की टोकरी के मुकाबले कैसा प्रदर्शन कर रहा है। जैसे सीपीआई बताता है कि महंगाई कितनी बढ़ी, वैसे ही नीर बताता है कि रुपया 2015-16 के बेस ईयर के मुकाबले आज कितना मजबूत है या कमजोर है। Rupee Fall यह सिर्फ डॉलर के खिलाफ नहीं, बल्कि भारत के पूरे वैश्विक व्यापार के पैमानों पर रुपए की ताकत को मापता है।
हालिया गिरावट (2025): जनवरी 2022 से जनवरी 2025 के बीच में नीर में गिरावट 3.4% की थी, एक तरह की स्थिरता थी, लेकिन 2025 में वही इंडेक्स में 9 महीनों में धड़ाम से गिरावट आई है और अब 84.58 हो गया। यह गिरावट यह बताती है कि रुपया हमारा जो है वो डॉलर के खिलाफ नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर दुनिया की 40 प्रमुख करेंसियों के सामने कमजोर हो रहा है और यह वास्तविक कमजोरी है।
जगन्नाथ विवाद पर स्पष्टीकरण: “राधा रानी के श्राप” की कथा और मेरी ओर से भक्तों से क्षमा याचना
III. रुपए का असली सच: REER (रीर) एनालिसिस
लेकिन असली तस्वीर जो है वो रीर (REER), रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट दिखाता है। इसे आप रुपए का सच कह सकते हैं, क्योंकि यह सिर्फ विनियम दर नहीं, बल्कि देशों की महंगाई का फर्क जोड़ कर देखता है। Rupee Fall अगर भारत में महंगाई बाकी देशों से ज्यादा है, तो चाहे रुपया थोड़ा मजबूत दिखे, असल में भारतीय सामान महंगा होने के चलते रियल वैल्यू रुपए की गिर जाएगी। रीर असली खेल बताता है कि भारत के उत्पाद दुनिया में कितने सस्ते या महंगे होंगे।
ओवरवैल्यूड से अंडरवैल्यूड की यात्रा: नवंबर 2024 में रीर 108.06 था, मतलब रुपया दुनिया के मुकाबले इतिहास में सबसे ज्यादा ओवरवैल्यूड था। यह भारत के निर्यात को दबा रहा था। लेकिन 11 महीने में सिर्फ इसमें 9.8% गिरावट आई है और यह 97.47 पहुँच गया—100 के नीचे। यानी अब रुपए की कीमत इतिहास में पहली बार अंडरवैल्यूड ज़ोन में पहुंच गई है।
‘ही-मैन’ का मौन सफ़र: धर्मेंद्र की सादगी, शोले की विरासत और करोड़ों दिलों का अटूट प्यार
IV. ऐतिहासिक बदलाव के दो कारण
यह बदलाव अचानक नहीं आया, इसके पीछे दो वजह थी।
- वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले कमजोरी: रुपया लगभग हर प्रमुख मुद्रा के मुकाबले कमजोर हुआ है, जिसमें डॉलर, यूरो, पाउंड, येन, यहाँ तक कि चीनी युवान, वो भी रुपए के मुकाबले महंगा हुआ। यह संकेत है कि समस्या सिर्फ डॉलर स्ट्रॉन्ग होने की नहीं है, बल्कि भारत के घरेलू वैश्विक आर्थिक वातावरण की सम्मिलित प्रक्रिया है।
- भारत में रिकॉर्ड निचली महंगाई: दूसरी वजह और महत्वपूर्ण है: भारत की महंगाई इतिहास में सबसे निचले स्तर पर आ गई है। अक्टूबर 2025 में सीपीआई इन्फ्लेशन सिर्फ 0.25% जबकि अमेरिका और यूरोप पर 2% से ज्यादा। यानी जब बाकी दुनिया महंगी हो रही थी और भारत स्थिर (और रुपया गिर रहा हो), तो रीर तेजी से नीचे आता है, जिससे रुपए की रियल वैल्यू कम होती है।
V. RBI की नई रणनीति: क्रॉल लाइक अरेंजमेंट
अब सवाल यह बनता है कि भारत के लिए अच्छा है या बुरा? निर्यातकों के लिए अच्छी स्थिति है क्योंकि भारतीय सामान दुनिया में पहले से सस्ता दिख रहा है।
आरबीआई की बदली हुई भूमिका: पहले आरबीआई रुपए को एक खास दायरे (82 से 83) पर पकड़े रहता था, हस्तक्षेप करता था। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। 26 नवंबर 2025 को आईएमएफ ने भारत को क्रॉल लाइक अरेंजमेंट में डाल दिया—यानी आरबीआई ना तो रुपए को खुला छोड़ रहा है, ना सख्ती से पकड़े हुए है। इसे ‘रेंगने दो, धीरे-धीरे गिरने दो लेकिन संभालकर’ वाली नीति समझा जा सकता है।
सस्ता रुपया: एक रणनीतिक हथियार: नए गवर्नर ने भी स्पष्ट किया कि आरबीआई अब ज्यादा दखल नहीं देगा। इसका एक कारण है कि भारत को अपनी प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए सस्ता रुपया Rupee Fall एक रणनीति हथियार की तरह इस्तेमाल करना पड़ रहा है, खासकर ट्रंप की टेरिफ़ की नीतियों और चीन के डंपिंग को देखते हुए।
VI. फायदा बनाम नुकसान और अंतिम सवाल
भविष्य की संभावना: आगे आने वाले महीनों में रुपया और गिरेगा, क्योंकि महंगाई नीचे है और आरबीआई का दखल सीमित हो।
फायदे: भारत की निर्यात क्षमता बढ़ सकती है, ग्लोबल कंपटीशन मजबूत होगा, भारत दुनिया में सस्ता नज़र आएगा।
नुकसान: विदेशी निवेशक रुपए की अस्थिरता से घबरा सकते हैं, लगातार रुपया आयात की लागत बढ़ा सकता है और गिरावट ज्यादा तेज हो जाए तो आर्थिक दबाव भी बन सकता है।
नई नीति का अध्याय: देखिए, 89.46 या 89.9 एक नंबर नहीं है, एक नई नीति का अध्याय है। यह वो पल है जब भारत ने तय किया कि हम महंगा रुपया रखकर एक्सपोर्ट मारने की बजाय सस्ता रुपया रखकर दुनिया में कॉम्पिटिटिव बनेंगे। हम इतना कह सकते हैं कि फिलहाल आप यह समझ लीजिए कि इस बार रुपया अपने आप नहीं गिरा, इस बार रुपए को बहुत सोच समझ कर छोड़ दिया गया।



