इंडिगो की होशियारी के चलते जब भारत के तमाम एयरपोर्ट बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से बदतर दिखने लगे, जब लाखों लोग परेशान होकर बेबस नजर आने लगे तो इस घटना ने भारत को डरा दिया। डराया इसलिए क्योंकि इस एक घटना ने यह बता दिया कि आज भारत के कुछ सेक्टरों में कंपनियाँ नहीं बल्कि साम्राज्य खड़े हो गए। सवाल यहीं से उठने लगा कि क्या हम भारतीय जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करते हैं, अब एक ऐसे युग में जा रहे हैं जहाँ पर हर जरूरी सेक्टर में एक-दो बड़ी कंपनियाँ होंगी और उन्हीं कंपनियों के सहारे यह देश चलेगा? आज फ्लाइट रुकी थी, कल क्या इंटरनेट रुकेगा, बिजली रुकेगा, पोर्ट रुकेगा, दवा रुकेगी, पानी रुकेगा और हर बार हमसे कहा जाएगा कि यह तकनीकी समस्या है।
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I. इंडिगो संकट: एक कंपनी द्वारा देश को बंधक बनाना
A. उड़ान में गड़बड़ी: तकनीकी समस्या नहीं, सिस्टम की संरचनात्मक समस्या
सच ये है कि इंडिगो वाली घटना में जो कुछ हुआ वो केवल तकनीकी समस्या नहीं थी, वो स्ट्रक्चरिकल समस्या थी, सिस्टम की समस्या जो जाने या अनजाने कुछ कंपनियों को इतना बड़ा बना गई कि आज वो सिस्टम से, सरकार से, 140 करोड़ लोगों से, उनके इमोशंस से कहीं ज्यादा बड़े। आज सवाल बड़ा यह है कि क्या अनजाने में एक ऐसा बड़ा सिस्टम बना है जो आगे आने वाले भविष्य में और कई इंडिगो बनाएगा?
B. मुनाफा बनाम नियम: सरकार क्यों हुई बैकफुट पर?
इंडिगो को नए रूल्स (पायलट ड्यूटी नियम) की तैयारी 6 महीने पहले से पता था लेकिन इंडिगो ने जानबूझकर इसे नहीं किया। पायलट और क्रू की कमी हुई और सारा नेटवर्क गड़बड़ा गया। सरकार को फिर आपात बैठक करनी पड़ी। टिकट के दामों पर कैप लगानी पड़ी, क्योंकि जो टिकट 3,000-6,000 का था वो 50,000 का मिल रहा था। DGCA ने इसके बाद इंडिगो के सीईओ को शो कॉज नोटिस भेजा और फिर जो नियम बनाए गए थे उनको टाल दिया। यह कैसे पॉसिबल हुआ कि प्राइवेट कंपनी की गलती के लिए सरकार को नियम क्यों हटाने पड़े? सरकार बैकफुट पर आई, डैमेज कंट्रोलिंग मोड में आई।
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C. बड़ा संदेश: बड़ी मार्केट शेयर वाली कंपनी देश को कैसे बंधक बना सकती है?
यह उस दिन की कहानी रही जब भारत ने महसूस किया कि एक कंपनी जिसके पास बड़ी मार्केट शेयर है वो कैसे पूरे देश को बंधक बना सकती है? कैसे अपनी शर्तों पर सरकार को झुका सकती है, नियमों को बदलवा सकती है, लोगों के इमोशंस के ऊपर जाकर सिर्फ मुनाफे पर फोकस कर सकती है? यह आज की गड़बड़ी नहीं है, कल का ट्रेलर है।
II. अगले इंडिगो की तलाश: अन्य सेक्टरों में एकाधिकार का खतरा
लोग पूछ रहे हैं, नेक्स्ट इंडिगो कौन? दूसरे सेक्टर में अगला इंडिगो कौन? क्योंकि कोई भी सेक्टर जिसके पास मोनोपोली, बड़ा मार्केट शेयर, वो तो परेशान करेगा।
A. टेलीकॉम सेक्टर: 74% मार्केट शेयर का राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम
आज पूरा वायरलेस बाजार जो है वो दो-तीन नामों के इर्द-गिर्द है: Jio, Airtel और Voda-Idea. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक Jio के पास 41.24% और Airtel के पास 33.53% मार्केट शेयर है। यानी दो बड़ी कंपनियाँ (Airtel और Jio) उनके पास मार्केट का 74% शेयर है। अगर किसी दिन तकनीकी गड़बड़ी या साइबर अटैक से सिस्टम ठप हो जाता है, तो देश में सिर्फ कॉल नहीं कटेगी, यूपीआई पेमेंट, इंटरनेट बैंकिंग, हॉस्पिटल की ऑनलाइन बुकिंग, दवाओं की डिलीवरी—ये सब कुछ एक झटके में रुक जाएगा। क्या यह सिर्फ बिजनेस रिस्क है या नेशनल सिक्योरिटी रिस्क भी है?
B. सीमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर: मध्यम वर्ग के लिए घर ‘लाइफ़टाइम लग्ज़री’ बनने का खतरा
अल्ट्राटेक 2025 में भारत में 183 से लेकर 190 मिलियन टन सालाना तक पहुँच चुकी है, जो देश की कुल क्षमता का लगभग 1/4 है। अगर इतनी बड़ी कंपनी और कुछ दूसरे प्लेयर्स के साथ मिलकर दाम को 25 से 30% बढ़ा दिए जाए तो मध्यम वर्ग के लिए घर बनाना जरूरत के बजाय लाइफ़टाइम लग्ज़री प्रोडक्ट हो जाएगा। सरकार और रेगुलेटर केवल यह कह सकते हैं कि भाई बाजार तय करेगा, लेकिन जब बाजार में असली ताकत मुट्ठी भर कंपनियों के हाथ में है तो आप कितना कंट्रोल कर पाएंगे?
C. पोर्ट्स और कार्गो सेक्टर: देश की सप्लाई चेन की निर्भरता
अडानी पोर्ट्स आज 14 पोर्ट और टर्मिनल चला रहा है, देश के कुल कार्गो वॉल्यूम का लगभग 27% अकेला हैंडल कर रहा है। भारत में आने जाने वाला लगभग हर चौथा टन माल, तेल, कोयला, अनाज, कंटेनर सब कुछ इन्हीं पोर्ट्स के नेटवर्क पर निर्भर है। अगर किसी बड़े विवाद या टेक्निकल फेलियर से ऑपरेशन रुक जाता है, तो देश के सप्लाई चेन, निर्यात, आयात, पेट्रोल पंप से लेकर फर्टिलाइजर सब पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
D. बिजली वितरण: उपभोक्ताओं के पास विकल्प की कमी
मुंबई, दिल्ली, सूरत, अहमदाबाद जैसे शहरों में बिजली वितरण कुछ ही कंपनियों के पास है। अगर बिल बढ़े तो क्या करेंगे? कंपनी बदलेंगे? बदलने को कौन है? यही मजबूरी मोनोपोली की पहचान है कि ऑप्शन क्या है हमारे पास?
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III. एकाधिकार की स्थापना: इंडिगो ने मार्केट पर कब्जा कैसे किया?
यह एक रात में नहीं हुआ। यह 15 से 18 साल की उनकी सिस्टैमिक रणनीति का नतीजा था।
A. पहला दौर: नो-फ्रिल्स मॉडल और एग्रेसिव एक्सपेंशन
2005-06 में जब इंडिगो भारत में आई तब भारत में जेट एयरवेज, किंगफिशर, एयर डेकन जैसी कई एयरलाइंस थीं। इंडिगो ने शुरुआत से तीन बातें तय करी: नो फ्रिल्स मॉडल, एग्रेसिव एक्सपेंशन और एयर बस A320 पर फोकस। एक ही तरह का विमान रखने से ट्रेनिंग, मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट सब कुछ सस्ता पड़ा। किराया कम रखा गया, शुरुआत में घाटा सहा गया, लेकिन मार्केट शेयर छीन लिया गया।
B. दूसरा दौर: प्रतियोगियों का पतन (जेट, किंगफिशर) और मार्केट कैप्चर
2012 से 18 के बीच में किंगफिशर बंद हो गई, जेट एयरवेज डूब गई। यह वो समय था जब इंडिगो अकेले मैदान में दौड़ रही थी। सरकार की उड़ान जैसी स्कीम्स के तहत नए एयरपोर्ट खुले, नए रूट खुले और सबसे ज्यादा फायदा जो था वो इंडिगो ने उठाया।
C. तीसरा दौर: कोविड के बाद स्लॉट पर कब्जा और अंतिम एकाधिकार
कोविड के बाद जब पूरी इंडस्ट्री टूट रही थी, तब गो फर्स्ट पूरी तरह बैठ गई और उसके लगभग सारे स्लॉट इंडिगो और एयर इंडिया को मिल गए। इससे इंडिगो का कब्जा और ज्यादा मजबूत हो गया। DGCA के मुताबिक इंडिगो लगातार 60 से 65% घरेलू मार्केट शेयर में बैठी है। इसका मतलब यह है कि इंडिगो ने आपके पास ऑप्शन ही नहीं छोड़ा है।
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IV. मोनोपोली का ख़तरा: लोकतंत्र और नियमों पर असर
A. नियमों में लचीलापन: सरकार ने क्यों हटाए FDTL सेफ्टी नियम?
पायलट एसोसिएशन एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि नए FDTL नियम ग्लोबल सेफ्टी स्टैंडर्ड्स के हिसाब से थे। लेकिन इसके बावजूद सबसे बड़ा खिलाड़ी पूरे समय पर्याप्त पायलट और क्रू हायर नहीं करता है। जब सिस्टम बैठ जाता है तो सरकार उसी के लिए नियम बदल देती है, अस्थाई ढील देती है। कुल मिलाकर मैसेज यह था कि जितना बड़ा आदमी या जितनी बड़ी कंपनी, जितना बड़ा मार्केट शेयर, वो अपने हिसाब से नियमों में उतना लचीलापन पा लेता है।
B. लोकतंत्र पर जोखिम: विकल्प का खत्म होना (ग्राहक शिकायत कर सकता है, पर बदल नहीं सकता)
मोनोपोली सिर्फ इकोनॉमिक इशू नहीं है, यह डेमोक्रेटिक इशू भी है। जब किसी भी सेक्टर में 60 से 70% ताकत एक कंपनी के पास होती है, तो नुकसान चॉइस के खत्म होने से होता है। आप नाराज हो सकते हैं, पर आप जा नहीं सकते। आप शिकायत कर सकते हैं, पर आप बदल नहीं सकते।
C. सरकार की भूमिका पर सवाल: क्या 50% मार्केट शेयर पर ‘रेड अलर्ट’ होना चाहिए?
क्या हम मर्जर और एक्विजिशन पर कोई कैप नहीं लगाएंगे? क्या हम यह तय नहीं करेंगे कि इंपॉर्टेंट सेक्टर में जहाँ करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं, वहाँ पर कोई एक कंपनी 50% से ऊपर मार्केट शेयर पर पहुँचे तो रेगुलेटर ऑटोमैटिकली रेड अलर्ट मोड में चला जाए?
V. निष्कर्ष: हम कैसा भारत चाहते हैं?
A. अंतिम सवाल: नागरिक कंपनियों के रहमोकरम पर जिंदा रहें, या नियम सभी पर बराबर लागू हों?
आज ये फ्लाइट कैंसिलेशन के रूप में दिख रहा है, कल यह असर डेटा प्राइस, बिजली टैरिफ, दवाओं की उपलब्धता, पानी के बिल, टोल टैक्स सब जगह दिख सकता है। ऐसे में सवाल हमसे भी है कि हम किस तरह का भारत बनाना चाहते हैं? वो भारत जहाँ नागरिक कंपनियों के रहमोकरम पर जिंदा रहें, या वो भारत जहाँ नियम सभी पर बराबर लागू हों?
B. इंडिगो की घटना: हमारे भविष्य का ट्रेलर।
इंडिगो की घटना शुरुआत है। इंडिगो ने सिर्फ फ्लाइट नहीं रोकी, उसने हमारे भविष्य का ट्रेलर दिखाया, वो भविष्य जहाँ पर कंपनियाँ कह सकेंगी, “मैं नहीं रुकूंगी, तुमको रुकना है, रुक जाओ।” और इसीलिए आखिरी सवाल जाते-जाते आपसे: हम कितने और इंडिगो बनने दें?
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