इंदौर त्रासदी: जब जनता की जान बनी ‘घंटा’—सत्ता के अहंकार का पूरा सच

इंदौर त्रासदी

I. परिचय: मासूमों की मौत और मंत्री की बदजुबानी

1 जनवरी 2026 को इंदौर में एक ऐसी त्रासदी हुई जिसने पूरे देश को झकझोर दिया, लेकिन उससे भी ज्यादा शर्मनाक रही सरकार की प्रतिक्रिया। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में सीवेज का गंदा पानी पेयजल लाइन में मिल गया, जिससे मासूम बच्चों और बुजुर्गों सहित कई लोगों की जान चली गई जब इस पर कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब था—“फोकट प्रश्न मत पूछिए, क्या घंटा हो गया?”

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II. इंदौर: चमकती सड़कों के नीचे ‘मौत का पानी’

इंदौर, जिसे देश का सबसे साफ शहर कहा जाता है, उसकी हकीकत इस त्रासदी ने खोल दी है:

  • भयानक त्रासदी: सीवेज रिसाव के कारण 10 लोगों की मौत का दावा किया गया है, जबकि 116 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हैं और हजारों लोग संक्रमण की चपेट में हैं 
  • सिस्टम की नाकामी: स्मार्ट सिटी के नाम पर हजारों करोड़ खर्च करने के बावजूद, बुनियादी पीने का पानी आज भी जानलेवा बना हुआ है। यह पाइपलाइन की तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और लापरवाही से हुई ‘सामूहिक हत्या’ है।

III. कैलाश विजयवर्गीय: बदजुबानी का पुराना पैटर्न

शुभंकर मिश्रा बताते हैं कि यह पहला मौका नहीं है जब मंत्री जी ने पीड़ितों के प्रति असंवेदनशीलता दिखाई हो:

  • अक्टूबर 2025 (छेड़खानी मामला): ऑस्ट्रेलियन महिला खिलाड़ियों के साथ हुई छेड़खानी पर उन्होंने सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने के बजाय खिलाड़ियों को ही टोक दिया था कि “बिना बताए बाहर क्यों निकलीं”।
  • पश्चिम बंगाल हिंसा: वहां हुई हत्याओं पर उन्होंने इसे “कुर्बानी” करार दिया था। यह लहजा सत्ता के उस अहंकार को दर्शाता है जहाँ जनता को ‘कीड़ा-मकोड़ा’ समझा जाता है।

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IV. डैमेज कंट्रोल या सिर्फ सियासत?

वीडियो वायरल होने और जनता के आक्रोश के बाद, अब सोशल मीडिया पर मुआवजे के ऐलान और अफसरों को सस्पेंड करने की खबरें फैलाई जा रही हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पश्चाताप है या अपनी कुर्सी और छवि बचाने की एक ‘पीआर एक्सरसाइज’? अफसरों को बलि का बकरा बनाना आसान है, लेकिन उस अहंकार का क्या जो जनता के सवालों को ‘फोकट’ समझता है?

V. लोकतंत्र में ‘घंटे’ के मायने

लोकतंत्र में जनता का सवाल सबसे ताकतवर होता है। जब एक जिम्मेदार मंत्री ‘घंटा’ शब्द का प्रयोग करता है, तो वह केवल एक सवाल को नहीं टाल रहा, बल्कि उस जनता के वजूद को नकार रहा है जिसने उसे सत्ता तक पहुँचाया  राजनीति अब सेवा से ज्यादा विज्ञापन और इवेंट पर टिक गई है—ऊपरी सतह चमका दी जाती है, लेकिन गहराई में व्यवस्थाएं सड़ रही हैं ।

VI. निष्कर्ष: सेवक या मालिक?

जनता को याद रखना होगा कि नेता ‘मालिक’ नहीं, बल्कि ‘सेवक’ हैं जिन्हें किराए पर शक्ति दी गई है । यदि बच्चों की मौत पर सवाल पूछना ‘फोकट’ है, तो फिर चुनाव के समय यही हाथ जनता के आगे क्यों फैलते हैं? अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था—”सरकारें आती-जाती रहेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए” । और लोकतंत्र में जनता के सवालों की जवाबदेही ही उसे जिंदा रखती है।

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