अरावली का अस्तित्व संकट में: क्या हम अपनी ‘सुरक्षा ढाल’ को खुद नष्ट कर रहे हैं?

अरावली

I. परिचय: अरावली केवल पहाड़ नहीं, एक जीवनरेखा है

अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, जो गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। शुभंकर मिश्रा के अनुसार, अरावली आज चुपचाप इंसानों से सवाल पूछ रही है कि क्या वे तभी संभलेंगे जब पानी पूरी तरह खत्म हो जाएगा और हवा और अधिक जहरीली हो जाएगी। अरावली एक ‘खामोश रक्षक’ की तरह है, जो हमें प्रदूषण, गर्मी और सूखे से बचाती है।

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II. विवाद की जड़: अरावली की नई ‘कानूनी परिभाषा’

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में अरावली को लेकर कुछ बातें सामने आईं, जिससे यह डर पैदा हो गया है कि कानून की नजर में अरावली के दायरे को छोटा किया जा रहा है।

  • 100 मीटर का नियम: एक समिति ने सुझाव दिया है कि केवल उन्हीं पहाड़ियों को ‘अरावली’ माना जाए जो अपने आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊंची हों।
  • ऊंचाई नापने का आधार: आमतौर पर ऊंचाई समुद्र तल से नापी जाती है, लेकिन अब इसे ‘आसपास की जमीन’ से नापने की बात हो रही है। चूंकि आसपास की जमीन समतल नहीं है (कहीं खुदाई हो चुकी है, कहीं भराव), इसलिए किसी भी पहाड़ी को कागज पर छोटा दिखाना आसान हो जाएगा।
  • खतरा: यदि कोई पहाड़ी 100 मीटर से कम ऊंची पाई गई, तो वह कानूनन ‘अरावली’ नहीं रहेगी। इसका मतलब है कि वहां से पर्यावरण संरक्षण के नियम हट जाएंगे और खनन (Mining), निर्माण और कंक्रीट के जंगल बनाने का रास्ता साफ हो जाएगा।

III. अरावली के टूटने का हम पर क्या असर होगा?

अरावली का कमजोर होना सीधे तौर पर हमारे जीवन को प्रभावित करेगा:

  1. जल संकट: अरावली की जमीन एक ‘स्पंज’ की तरह काम करती है, जो बारिश के पानी को सोखकर भूजल (Groundwater) रिचार्ज करती है। अरावली खत्म हुई तो राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में पानी का स्तर और नीचे गिर जाएगा।
  2. जहरीली हवा और गर्मी: थार मरुस्थल से आने वाली धूल भरी गर्म हवाओं को अरावली रोकती है। इसके जंगल प्रदूषण के कणों को सोख लेते हैं। अरावली हटी तो दिल्ली-एनसीआर में सांस की बीमारियां, अस्थमा और गर्मी का प्रकोप रिकॉर्ड तोड़ देगा।
  3. वन्यजीव संघर्ष: तेंदुआ, सियार और नीलगाय जैसे जानवरों के प्राकृतिक रास्ते बंद हो जाएंगे, जिससे वे इंसानी बस्तियों की ओर रुख करेंगे।
  4. महंगाई: खेती के लिए मिट्टी में नमी अरावली के कारण बनी रहती है। अरावली के अभाव में पैदावार घटेगी और फल-सब्जियां महंगी हो जाएंगी।

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IV. विकास बनाम विनाश का खेल

1980 के दशक से ही अरावली पर पत्थर और बजरी के लिए अवैध खनन का दबाव बना हुआ है। सरकार का तर्क है कि पूरी तरह रोक लगाने से अवैध खनन बढ़ता है, इसलिए ‘नियंत्रित रास्ता’ जरूरी है। लेकिन पर्यावरणविदों को डर है कि नियमों में ढील देकर पहाड़ों को बेचने की तैयारी की जा रही है।

V. निष्कर्ष: आने वाली पीढ़ी नहीं, आज की समस्या

शुभंकर मिश्रा जोर देते हैं कि अरावली को बचाना केवल भविष्य के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की सुरक्षा के लिए जरूरी है। अगर हमने आज के छोटे फायदे के लिए इस ढाल को कमजोर किया, तो इसका बोझ हमें जहरीली हवा और सूखे के रूप में उठाना पड़ेगा।

फैसला हमें करना है—हमें कंक्रीट का जंगल चाहिए या वह पहाड़ जो सदियों से हमारी रक्षा कर रहा है?

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