I. भयावह सिलसिला: कश्मीर से सिडनी के तट तक
कश्मीर का पहलगाम और सिडनी का बॉन्डी बीच—दो बिल्कुल अलग जगहें, दो अलग महाद्वीप। फिर भी, उनमें एक भयावह समानता है: दोनों स्थानों पर छुट्टी मनाने गए परिवारों का जीवन क्रूरता से समाप्त कर दिया गया, और उनकी पहचान ही उनके कत्ल की एकमात्र वजह बनी।
सिडनी में हाल ही में हुए हमले, जहाँ पाकिस्तान के पिता-पुत्र की जोड़ी ने हनूक्का मना रहे लोगों को निशाना बनाया, कोई अकेली घटना नहीं है। वीडियो तर्क देता है कि अमेरिका के 9/11 से लेकर भारत के 26/11 तक, और कश्मीर के पहलगाम से लेकर सिडनी तक, हमलावरों की जड़ें अक्सर पाकिस्तान और उसकी मजहबी कट्टरता से जुड़ी होती हैं।
यह वह “असहज सच” है जिसे दुनिया में कई लोग नज़रअंदाज़ करना या राजनीतिक शुद्धता के पीछे छिपाना पसंद करते हैं।
II. अत्याचारों में समानता: निशाना चुन-चुन कर
वीडियो पहलगाम और ऑस्ट्रेलिया दोनों में हमलों की लक्षित (targeted) प्रकृति पर प्रकाश डालता है:
- पहलगाम (कश्मीर, 2025): आतंकवादी आए, पहचान पूछी, और विशेष रूप से हिंदुओं को खोजा। उन्होंने मुसलमानों को अलग कर दिया और फिर व्यवस्थित तरीके से 26 हिंदुओं का नरसंहार किया, साथ ही बची हुई महिलाओं से कहा कि वे जाकर सबको बताएँ कि “उन्हें इसलिए मारा गया क्योंकि वे हिंदू थे।”
- बॉन्डी बीच (सिडनी, ऑस्ट्रेलिया): हमला तब हुआ जब यहूदी समुदाय हनुक्का, यानी अंधेरे पर रोशनी की जीत का त्योहार मना रहा था। हमलावरों को पूरी तरह पता था कि वे किसे निशाना बना रहे हैं।
ये दोनों घटनाएँ अंधाधुंध हिंसा नहीं, बल्कि धार्मिक पहचान के आधार पर की गई सुनियोजित हत्याएँ थीं। आतंकवादियों को पता था कि वे किसे मार रहे हैं और, इससे भी महत्वपूर्ण, क्यों।
III. खतरनाक चुप्पी: “आतंकवाद का कोई मजहब नहीं”
वीडियो में सबसे बड़ी आलोचना उस लोकप्रिय धर्मनिरपेक्ष तर्क की की गई है: “आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता।”
वीडियो स्वीकार करता है कि सैद्धांतिक रूप से यह बात बिल्कुल सही है। हालाँकि, यह तर्क दिया गया है कि व्यवहार में, यह कथन अधूरा है और अक्सर चुप्पी को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल होता है।
- धर्म का हथियार: “आतंकवाद का कोई मजहब भले न हो, लेकिन आज के दौर में आतंकवादी मजहब का नाम लेकर गोलियाँ चला रहे हैं”। अपराधी केवल धर्म को पहचान के रूप में नहीं, बल्कि हथियार उठाने की वजह के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
- एक बीमार विचारधारा: यह हिंसा कट्टरपंथियों द्वारा सिखाई गई एक बीमार विचारधारा से उपजी है, जो यह झूठ बेचते हैं कि गैर-मुसलमानों को मारने से जन्नत मिलती है और 72 हूरें मिलेंगी।
- चुप्पी अपराध है: जब हिंसा धर्म के नाम पर की जाती है, तो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस धार्मिक पहलू को नज़रअंदाज़ करना अपराध जैसा है, जो सुनिश्चित करता है कि हमलों का यह सिलसिला जारी रहेगा।
IV. अंतरराष्ट्रीय फंडिंग की भूमिका: IMF पर सवाल
यह लेख अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से आईएमएफ (IMF) जैसी संस्थाओं के लिए एक गंभीर सवाल उठाता है:
- आग में घी: “क्या आईएमएफ पाकिस्तान को इसलिए भीख देता है ताकि वही पैसा आतंक की आग बनकर कभी पहलगाम में हिंदुओं पर बरसे, कभी बॉन्डी बीच पर यहूदियों की रोशनी को बुझा दे?”।
- जवाबदेही क्यों नहीं: पाकिस्तान का लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी समूहों को पनाह देने का दशकों पुराना इतिहास है (ओसामा बिन लादेन सैन्य अकादमी के पास पाया गया था), फिर भी उसे अरबों डॉलर की मदद क्यों दी जाती है, वह भी सख्त निगरानी, स्पष्ट शर्तों और मजबूत जवाबदेही के बिना यह सुनिश्चित किए कि पैसा आतंकवाद को हवा न दे?
- मदद या मौत: दुनिया को तय करना होगा कि क्या वह इस पैसे से पाकिस्तान के लोगों को बचा रही है, या अनजाने में कहीं किसी मासूम बच्चे की मौत का इंतज़ाम कर रही है।
V. भारत बनाम पश्चिम: नैरेटिव में अंतर
वीडियो में आतंकवाद के बाद भारत और पश्चिमी देशों द्वारा अपनाए जाने वाले दृष्टिकोणों की तुलना की गई है, और तर्क दिया गया है कि भारत का नज़रिया खतरनाक रूप से नरम है:
| पहलू | पश्चिमी दृष्टिकोण (जैसे सिडनी) | भारतीय दृष्टिकोण (जैसे मीडिया/समाज) |
| पहचान | हमलावर को तुरंत और स्पष्ट रूप से आतंकवादी और अपराधी करार दिया जाता है। | ध्यान अपराध से हटकर अपराधी के पृष्ठभूमि पर चला जाता है। |
| कथा | सीधी समझ: निर्दोष लोगों पर हथियार उठाने वाला कोई भी व्यक्ति अपराधी है। बात खत्म। | जटिल सिद्धांत: वह बेचारा गरीब था, उसके पिता नेक इंसान थे, उसके बड़े सपने थे (क्रिकेटर बनना), सिस्टम की गलती थी, या यह सरकार की कोई चाल थी। |
| परिणाम | ध्यान पीड़ित के न्याय पर केंद्रित रहता है। | पीड़ित को भुला दिया जाता है, और जनता के दिमाग में अपराधी के लिए सहानुभूति पैदा की जाती है। |
वीडियो निष्कर्ष निकालता है कि आतंकवादी को मानवीय चेहरा देने और बहाने गढ़ने की यह भारतीय प्रवृत्ति भौतिक हमलों से भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह मूल विचारधारा को पनपने देती है।
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VI. निष्कर्ष: आगे का रास्ता
मूल समस्या अब सीमाओं की नहीं, बल्कि सोच की है। आतंकवाद अब पासपोर्ट लेकर आता है, देश और पहचान बदल लेता है, लेकिन नफरत नहीं बदलती।
वीडियो के अनुसार, आगे का रास्ता स्पष्ट है और इसके लिए वैश्विक बदलाव की आवश्यकता है:
- सहानुभूति नहीं, सख्ती: आतंकवाद सहानुभूति से नहीं, सख्ती से मरता है। आतंकवादियों को परिस्थितियों का शिकार बताकर पेश करने वाले तर्कों से ज्यादा खतरनाक और कुछ नहीं है।
- नाम लेकर पर्दाफाश: दुनिया को धर्मनिरपेक्ष बहानों के पीछे न छिपकर, हिंसा के पीछे की कट्टर धार्मिक विचारधारा को खुले तौर पर बेनकाब करना होगा।
- पाकिस्तान की जवाबदेही: अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान को अपना घर साफ करने और “अच्छा आतंकवाद, बुरा आतंकवाद” का खेल बंद करने के लिए मजबूर करना होगा।
पहलगाम की चीखें और बॉन्डी बीच की बुझी हुई रोशनियाँ सिर्फ खबर नहीं हैं; वे एक चेतावनी हैं। इतिहास केवल अपराधियों से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी सवाल करेगा जिन्होंने सब कुछ देखा, सच को समझा, और फिर भी चुप रहे।



