ब्लैक टाइगर: भारत के उस असली ‘टाइगर’ की कहानी जो पाकिस्तान की जेल में गुमनाम मौत सो गया

ravindra kaushik

I. परिचय: रील बनाम रियल लाइफ हीरो

हम अक्सर ‘एक था टाइगर’, ‘पठान’ या ‘धुरंधर’ जैसी फ़िल्में देखकर सिनेमाघरों में सीटियाँ बजाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन फ़िल्मों के किरदारों के पीछे एक ऐसा असली नायक था जिसका जीवन और अंत किसी भी फ़िल्मी पटकथा से कहीं अधिक साहसी और दुखद था? यह कहानी है रविंद्र कौशिक की, जिन्हें रॉ (RAW) ने ‘ब्लैक टाइगर’ का नाम दिया था। वह पाकिस्तान में जाकर केवल गुंडा नहीं बने, बल्कि वहां की फ़ौज में अधिकारी बनकर भारत की रक्षा की।

II. रविंद्र कौशिक का ‘नबी अहमद शाकिर’ बनने का सफर

राजस्थान के श्रीगंगानगर में 1952 में जन्मे रविंद्र कौशिक एक साधारण परिवार से थे। थिएटर और अभिनय के प्रति उनके जुनून ने रॉ के अधिकारियों का ध्यान खींचा।

  • पहचान मिटाना: 1973 में रॉ ने उन्हें भर्ती किया और उनकी पुरानी पहचान पूरी तरह मिटा दी। उन्हें उर्दू, अरबी और कुरान की आयतें सिखाई गईं। वह केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक मुसलमान के रूप में ढल गए।
  • पाकिस्तान में घुसपैठ: उन्हें ‘नबी अहमद शाकिर’ के नाम से पाकिस्तान भेजा गया। वहां उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से एलएलबी की, पाकिस्तानी लड़की से शादी की और उनकी एक बेटी भी हुई
  • पाकिस्तानी सेना में भर्ती: अपनी बुद्धिमत्ता के बल पर वह पाकिस्तानी सेना में भर्ती हुए और मेजर के पद तक पहुँचे। वहां से उन्होंने रॉ को ऐसी गोपनीय जानकारियाँ भेजीं जिसने कई बार भारत को युद्ध जैसी स्थितियों से बचाया।

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III. जाबांज़ का गिरफ़्तार होना और यातनाओं का दौर

रविंद्र कौशिक की गिरफ़्तारी उनकी अपनी किसी गलती से नहीं, बल्कि एक दूसरे जासूस की चूक की वजह से हुई

  • क्रूर यातनाएँ: 1979 में गिरफ़्तार होने के बाद उन्हें मियांवाली और सियालकोट की जेलों में रखा गया। उन्हें बिजली के झटके दिए गए, नाखून उखाड़े गए और भूखा रखा गया ताकि वह अपनी भारतीय पहचान स्वीकार कर लें। लेकिन ‘ब्लैक टाइगर’ ने अंत तक यही कहा कि वह ‘नबी अहमद’ हैं 
  • मौत की सजा: 1985 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई, जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया।

IV. देश की खामोशी: एक जासूस का सबसे बड़ा दर्द

जासूसी की दुनिया का सबसे कड़वा सच यह है कि पकड़े जाने पर देश अपने जासूस को पहचानने से इंकार कर देता है। रविंद्र कौशिक के साथ भी यही हुआ।

  • अस्वीकार्यता: भारत सरकार ने उन्हें कभी आधिकारिक तौर पर अपना नागरिक या जासूस नहीं माना, क्योंकि ऐसा करने पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जवाबदेही तय होती।
  • गुमनाम चिट्ठियाँ: जेल से उन्होंने भारत सरकार को कई चिट्ठियाँ लिखीं, अपनी जान की गुहार लगाई, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला। रॉ के लिए वह एक ‘कॉम्प्रोमाइज्ड एसेट’ बन चुके थे जिन्हें फाइलों में बंद कर दिया गया।
  • परिवार का संघर्ष: उनके परिवार ने उनकी रिहाई के लिए सालों लड़ाई लड़ी, लेकिन सिस्टम की खामोशी ने उनके सारे प्रयास विफल कर दिए।

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V. दुखद अंत: एक गुमनाम मौत

सालों की जेल और यातनाओं ने उनके शरीर को जर्जर कर दिया था। उन्हें टीबी और दिल की बीमारी हो गई थी 

  • 21 नवंबर 2001: पाकिस्तान की मुल्तान जेल में भारत के इस महान नायक ने अंतिम सांस ली। उनकी मौत पर न कोई राष्ट्रीय शोक हुआ, न कोई तिरंगा चढ़ाया गया और न ही कोई सरकारी बयान आया 
  • अंतिम संस्कार: उन्हें एक गुमनाम कैदी की तरह जेल के पीछे ही कहीं दफना दिया गया। जिस आदमी ने हजारों भारतीयों की जान बचाई, उसे अपने देश की दो गज जमीन भी नसीब नहीं हुई

VI. निष्कर्ष: क्या हम अपने नायकों के साथ न्याय कर रहे हैं?

रविंद्र कौशिक की कहानी हमें याद दिलाती है कि देश केवल नारों और फ़िल्मों से नहीं, बल्कि उन गुमनाम हीरोज़ से बनता है जो अंधेरे में रहकर हमारी सुरक्षा करते हैं।

फ़िल्मों में हीरो अंत में घर लौट आता है, लेकिन रविंद्र कौशिक कभी नहीं लौट पाए यह लेख उन सभी गुमनाम जासूसों को श्रद्धांजलि है जो सिस्टम की खामोशी और दुश्मन की सलाखों के पीछे दम तोड़ देते हैं।

जब भी आप सिनेमाघरों में किसी जासूसी फ़िल्म के लिए तालियाँ बजाएँ, तो एक पल के लिए रविंद्र कौशिक जैसे असली ‘ब्लैक टाइगर’ को जरूर याद करें।

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