जब सरहदें बँट गईं, भगवान नहीं: पाकिस्तान के हिंदू मंदिरों की अनकही त्रासदी

पाकिस्तान के हिंदू मंदिरों

I. परिचय: सरहद पार खामोश भगवान

1947 का बंटवारा केवल जमीन और लोगों का बंटवारा नहीं था, यह आस्थाओं और स्मृतियों का भी बंटवारा था। यह कहानी उन देवताओं की है जिनसे यह नहीं पूछा गया कि उन्हें पूजने वाले अब सरहद के किस पार रहेंगे। पाकिस्तान में बिखरे ये मंदिर आज केवल खंडहर नहीं हैं, बल्कि वे एक गहरी खामोशी में डूबे सवाल हैं।

उन्नाव केस: क्या “बेटी बचाओ” केवल एक नारा है? कुलदीप सेंगर और इंसाफ की 7 साल लंबी जंग

II. प्रमुख तीर्थ और उनकी वर्तमान स्थिति

वीडियो में पाकिस्तान के उन प्रमुख स्थानों का जिक्र है जो कभी हिंदू आस्था के केंद्र थे:

  • कटासराज मंदिर (शिव के आंसू): मान्यता है कि माता सती के आत्मदाह पर जब शिव रोए, तो उनके आंसुओं से यह कुंड बना। यहाँ कभी संस्कृत की शिक्षा और शास्त्रार्थ होते थे। आज यहाँ मंदिर तो हैं, लेकिन भक्त नहीं। आसपास की फैक्ट्रियों के कारण ‘शिव के आंसू’ कहे जाने वाले इस कुंड का पानी भी अब सूखने लगा है।
  • हिंगलाज माता (बलूचिस्तान): रेगिस्तान और पहाड़ों के बीच गुफा में स्थित यह शक्तिपीठ आज भी जीवित आस्था का प्रतीक है। यहाँ की यात्रा आज भी कठिन है, लेकिन लोग इसे अपनी पहचान और जड़ों से जुड़ने का माध्यम मानते हैं।
  • शारदा पीठ (नीलम घाटी): यह कभी एक महान विश्वविद्यालय था जहाँ आदि शंकराचार्य आए थे। आज यहाँ केवल पत्थर की दीवारें हैं, ज्ञान और मंत्रों की गूँज गायब हो चुकी है।
  • गोरखनाथ मंदिर (पेशावर): यह नाथ संप्रदाय का बड़ा केंद्र था। आज यह एक ऐतिहासिक स्थल तो है, लेकिन इसका वह धार्मिक संदर्भ खो चुका है।

III. बंटवारे की त्रासदी: जब भक्त चले गए, भगवान रह गए

1947 की उस रात जब लोग अपनी जान बचाने के लिए भागे, तो कई पुजारियों के पास मंदिरों की चाबियाँ रह गईं, जो फिर कभी नहीं खुलीं। इतिहास ने आंकड़ों में बताया कि कितने लोग मरे, लेकिन यह नहीं बताया कि कितनी जगहों पर ‘दिया’ जलना हमेशा के लिए बंद हो गया। जो मंदिर दंगों में नहीं टूटे, वे समय की उपेक्षा, लालच और प्रशासनिक अनदेखी के कारण खोखले होते गए।

डॉनल्ड ट्रंप और जेफरी एपस्टीन: सत्ता, ब्लैकमेल और रसूख के काले खेल का पर्दाफाश

IV. पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं का जीवन

जो हिंदू परिवार पाकिस्तान में रह गए, उनकी पूजा अब ‘उत्सव’ से सिमटकर ‘निजी क्षण’ बन गई है। अब पूजा ऊँचे स्वर में नहीं, बल्कि दीवारों के पीछे फुसफुसाहट में होती है। होली और दिवाली अब खुले मैदानों के बजाय घर के भीतर मनाई जाती है ताकि किसी को ‘असहज’ न करें। कई घरों में आज भी विभाजन से पहले की मूर्तियाँ हैं, जो उनके लिए केवल देवता नहीं, बल्कि उस घर की आखिरी निशानी हैं जो पीछे छूट गया।

V. निष्कर्ष: क्या भगवान का भी बंटवारा हो सकता है?

यह कहानी किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ‘सांस्कृतिक टूटन’ की है जिसे जोड़ना आसान नहीं है। मंदिर पत्थरों से नहीं, लोगों से बनते हैं, और जब लोग चले जाते हैं, तो देवता भी एक लंबे इंतजार में चले जाते हैं। पाकिस्तान के ये हिंदू मंदिर हमें याद दिलाते हैं कि इतिहास उतना सरल नहीं है। ये मंदिर आज भी वहीं खड़े हैं, यह पूछने के लिए—“क्या सरहदों का बंटवारा भगवान का भी बंटवारा कर सकता है?”

Read More: https://webstory.clogtheblog.com/how-a-tea-seller-built-a-%e2%82%b92000-crore-empire/

Leave a Comment

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Scroll to Top